
बेगूसराय/ चूड़ामणि अनुभव
राजेश कुमार सिन्हा
यह कहना बिल्कुल उचित है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि विचार, संवेदना और सामाजिक चेतना का वह शक्तिशाली उपकरण है जिसने भारतीय समाज के सोचने और देखने का तरीका गहराई से प्रभावित किया है। भारत जैसे अनूठे देश में, जहाँ भाषा, धर्म, जाति और वर्ग की विविधताएँ एक साथ मौजूद हैं, सिनेमा एक सांस्कृतिक सेतु की तरह उभरता है जो लोगों को जोड़ता भी है और उन्हें नई दिशा भी देता है। आज सिनेमा सिर्फ समाज का आईना नहीं, बल्कि उसका दिशा-निर्देशक बन चुका है।भारत में सिनेमा की यात्रा 1913 में दादा साहब फाल्के की “राजा हरिश्चंद्र”से शुरू हुई। प्रारंभिक दौर में फिल्में पौराणिक कथाओं और धार्मिक आदर्शों पर आधारित थीं, जिनका उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ नैतिक मूल्यों का प्रसार था। जैसे जैसे आधुनिकता और औद्योगिकीकरण का प्रभाव बढ़ा, सिनेमा ने भी आम आदमी की समस्याओं और संघर्षों को केंद्र में रखना शुरू किया। यह वह समय था जब फिल्मों ने पहली बार समाज की सोच में हलचल पैदा की। ब्रिटिश शासन के दौरान सेंसर कड़े थे, फिर भी “अछूत कन्या,” “धरती के लाल” और “किसान कन्यासी जैसी फिल्मों ने समरसता, समानता और सामाजिक न्याय की भावना को मजबूत किया।स्वतंत्रता के बाद सिनेमा ने राष्ट्र निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। “दो बीघा ज़मीन” “जागृति,” “हम हिंदुस्तानी “और “पूरब और पश्चिम”जैसी फिल्मों ने नागरिक जिम्मेदारी, नैतिक मूल्यों और आधुनिकता के बीच संतुलन का संदेश दिया। वहीं 1957 की “मदर इंडिया” भारतीय सिनेमा की ऐसी ऐतिहासिक फिल्म बनी जिसने माँ को राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक बना दिया। राधा का चरित्र दर्शकों में यह विश्वास जगाता है कि नैतिकता रिश्तों से ऊपर है।सत्तर और अस्सी के दशक में सिनेमा समाज के भीतर छिपे असंतोष का दर्पण बन गया। इस दौर में अमिताभ बच्चन का “एंग्री यंग मैन” एक नई सामाजिक चेतना को जन्म देता है। “जंजीर” “दीवार” और “शोले “जैसी फिल्मों ने आम जनता को यह संदेश दिया कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस हर व्यक्ति में है। यह केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि सामाजिक विद्रोह और परिवर्तन का संकेत भी था।सिनेमा नारी के प्रति समाज की दृष्टि को बदलने का बड़ा माध्यम रहा है, जहाँ शुरुआती वर्षों में नारी पात्र केवल सौंदर्य और भावुकता से जुड़े थे, वहीं समय के साथ फिल्में जैसे “अर्थ,” ” मिर्च मसाला” “दामिनी”, क्वीन और थप्पड़ ने स्त्री की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और अधिकारों पर गहरी चर्चा छेड़ी। इन फिल्मों ने नारी विमर्श को घर-घर तक पहुँचाया और समाज को नए दृष्टिकोण दिए।कुछ फिल्मों ने दर्शकों के व्यक्तिगत और मानसिक स्तर पर भी प्रभाव डाला। “तारे ज़मीन पर “ने अभिभावकों और शिक्षकों का नजरिया बदला, थ्री इडियट्स ने युवाओं को सपनों की राह चुनने की प्रेरणा दी, पीके और “ओह माय गॉड “ने धार्मिक मान्यताओं पर संवाद आरंभ किया। “चक दे इंडिया” ने खेल, देशभक्ति और महिला सशक्तिकरण को नए रूप में प्रस्तुत किया। इन फिल्मों ने मनोरंजन के साथ-साथ समाज में सोच का बीज बोया। 21वीं सदी में सिनेमा का प्रभाव और भी व्यापक हो गया है। “रंग दे बसंती” ने युवाओं को सक्रिय नागरिकता का संदेश दिया, वहीं “स्वदेस”ने प्रवासी भारतीयों को अपनी जड़ों की ओर लौटने की प्रेरणा दी। ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ने विषयों का दायरा और बढ़ा दिया है। अब मानसिक स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, पर्यावरण, एल जी बी टी क्यू+ अधिकार और वृद्धावस्था जैसी विषय-वस्तुएँ मुख्यधारा का हिस्सा बन चुकी हैं। “देहली क्राइम”, “थ्री ऑफ अस”, “मेड इन हेवन” जैसी कृतियाँ सिनेमा की संवेदना और सामाजिक दृष्टि को नई दिशा देती हैं।
सिनेमा की ताकत उसकी दृश्य भाषा में है, एक फ्रेम, एक संवाद, और एक गीत किसी भी किताब से अधिक प्रभाव डाल सकता है। “मुग़ल-ए-आज़म”का प्रेम, “शोले” की दोस्ती, “लगान” का स्वाभिमान आदि ये केवल कथाएँ नहीं, बल्कि विचारों के स्थायी रूप हैं। “दीवार सीका “मेरे पास माँ है” और सीथ्री इडियट्स” का “ऑल इज़ वेल” समाज के भावनात्मक मूल्यों का हिस्सा बन चुके हैं।यह स्पष्ट है कि सिनेमा का प्रभाव टिकट बिक्री या बॉक्स ऑफिस से कहीं आगे तक जाता है। यह समाज को दर्पण भी दिखाता है और भविष्य की दिशा भी देता है। यह उपदेश नहीं देता, लेकिन सहज रूप से सोच बदल देता है। आज जब दुनिया सोशल मीडिया और वर्चुअल जीवन की ओर बढ़ रही है, सिनेमा अब भी वह मंच है जहाँ समाज अपने भीतर झाँकना सीखता है। थोड़े में कहें तो सिनेमा केवल कला नहीं, एक मौन शिक्षक है जो हर दर्शक को कुछ न कुछ सिखाकर ही वापस भेजता है। सच ही कहा गया है
“यदि समाज को बदलना है, तो शुरुआत सिनेमा से करनी होगी”