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बिहार

उपजाऊ जमीन झाड़ी में तब्दील: समस्या जटिल

काबर बगरस नहर परियोजना पर लगा ग्रहण

मझौल/ बेगूसराय

महेश भारती

काबर टाल पक्षी विहार परियोजना से किसानों व गरीबों के विस्थापन का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। इसे लेकर प्रसिद्ध समाजसेवी और नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर के समर्थन से मुद्दा गरमा गया है। किसानों और मजदूरों का कहना है कि काबर टाल पक्षी विहार परियोजना की समीक्षा हो। पिछले चालीस साल से
जमीन के मुआवजे दिए बिना किसानों की जमीन फंसी हुई है। किसानों का कहना है कि काबर क्षेत्र के किसानों,मछुआरों , मजदूरों की जिंदगी को तबाह होने से बचाने का एकमात्र उपाय है इस योजना की समीक्षा हो।
आजादी के बाद ही वर्ष 1950-51 में
बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ श्री कृष्ण सिंह और सिंचाई मंत्री रामचरित्र सिंह ने काबर टाल क्षेत्र के जलप्लावन की समस्या के निदान के लिए काबर बगरस नहर परियोजना बनवा कर इलाके का उद्धार कर दिया था।इस नहर परियोजना के पूरा होने से काबर की उपजाऊ भूमि को धान का कटोरा ” कहा जाने लगा था। लेकिन, लगभग 35 बरसों बाद कांग्रेस पार्टी की सरकार ने 1986-1989 में काबर झील पक्षी विहार अभ्यारण्य की अधिसूचना जारी कर काबर नहर परियोजना की मंशा पर पानी फेर दिया। काबर बगरस नहर की सफाई नहीं होने से और अस्थाई रूप से बंद हो जाने की वजह से काबर टाल क्षेत्र की उपजाऊ जमीन नरकट की झाड़ी में तब्दील हो गया।काबर नहर परियोजना के बेकार होने की वजह से काबर क्षेत्र में धान की खेती स्थाई रूप से बंद हो गई। जिस काबर टाल में मछुआरों के नाव से धान की कटनी होती थी और किसानों और मछुआरों के घर धान से भरे होते थे, वे अकालग्रस्त और बेकार हो गए‌ ।
सूखे और कमतर पानी तथा बेतरतीब व्यवस्था के बावजूद इसे रामसर साईट घोषित कर दिया गया।
अब रामसर साइट की घोषणा के बाद सरकार और वन विभाग के अधिकारियों ने यहां करोड़ों का काबर झील विकास का प्रोजेक्ट तैयार किया है।इस परियोजना को लागू करने की जमीन किसानों की है और वे बरसों से न्यायालय से सड़क तक संघर्ष करते रहे हैं। काबर टाल क्षेत्र की 1989 में अधिसूचित क्षेत्र की 90 % भूमि के स्वामित्व संबंधित दस्तावेज किसानों के पास है।1989 में पक्षी विहार की अधिसूचना जारी होने के बाद किसान अपनी जमीन का राजस्व सरकारी खजाने में जमा करते रहे और आज भी वे उनके स्वामित्व में है। जाहिर है कि दस्तावेजी तौर पर किसानों का स्वामित्व यहां की जमीन पर कायम है। सरकार को इस बिंदु पर विचार करना चाहिए कि अगर सरकार काबर झील पक्षी परियोजना पर हजारों करोड़ खर्च कर सकती है तो इस योजना से प्रभावित किसानों,मछुआरों ,कृषक मजदूरों को जमीन की कीमत,आजीविका ,पुनर्वास की व्यवस्था भी करे। मानवीय जीवन और सरोकार पर कुछ हजार करोड़ का खर्च क्यों नहीं करेगी।सुप्रीम कोर्ट का सख्त निर्देश भी है कि बिना पुनर्वास और मुआवजे के विस्थापन और निर्माण की स्वीकृति नहीं दी जा सकती है। काबर परिक्षेत्र आज विस्थापन, किसानों के दर्द और अपनी ही जमीन की रजिस्ट्री न कर पाने के दर्द से परेशानी में हैं। वर्ष 2013 से ही यहां की जमीन की रजिस्ट्री पर एक सनकी कलक्टर ने पाबंदी लगाकर भूस्वामी के भविष्य पर बेड़ियां लगा दी थी। अगर हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट बनाकर सरकार की राशि के बंदरबांट के लिए जरूरी छद्म है तो देश के सबसे बड़े विस्थापन विरोधी आंदोलन की यहां जरूरत है‌ । काबर परिक्षेत्र के किसानों को आंदोलन से ही देश में सबसे बेहतर पुनर्वास का अधिकार प्राप्त हो सकता है। माननीय भारत की सुप्रीम कोर्ट ने ” without Rehabilitation no Displacement, Without Compensation no Displacement” ( “पुनर्वास के बिना विस्थापन नहीं,मुआवजा के बिना विस्थापन नहीं का आदेश दिया हुआ है।

काबर क्षेत्र में -30-40 वर्षों से धान की खेती बंद है तो साइबेरिया से आने वाले मेहमान पंछियों के लिए आहार धान कहां से आएंगे ?
प्राकृतिक झील की पुनर्वापसी मुमकिन नहीं होने से किसानों और मजदूरों के आजीविक पर संकट हैं।
काबर झील के असली रक्षक मछुआरे और धान के कृषक हैं। इसलिए जरूरी है कि इनके हित को देखते हुए ही भारत और बिहार की सरकार कोई प्रोजेक्ट बनावे।

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