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बॉलीवुड

स्त्री अभिनय का नहीं स्त्री दृष्टि का वर्ष रहा 2025

बेगूसराय / चूड़ामणि अनुभव

राजेश कुमार सिन्हा

भारतीय सिनेमा के इतिहास में यदि किसी एक तथ्य को बार बार दोहराया जाए, तो वह यह है कि यहाँ सदैव समृद्ध अभिनय की परंपरा सदैव रही है। विशेष रूप से महिला कलाकारों ने हर दौर में अपनी प्रतिभा से दर्शकों और आलोचकों को चकित किया है। नर्गिस, मीना कुमारी, वहीदा रहमान, मधुबाला, शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, रेखा, डिंपल कपाड़िया, काजोल, तब्बू, विद्या बालन , बेशक यह सूची लंबी है और गौरवपूर्ण भी। तथापि, ऐसा कहा जाना प्रासंगिक होगा कि वर्ष 2025 को इन सभी गौरवशाली वर्षों से अलग पहचान देने वाला तत्व थोड़ा अलग है और यकीनन वह केवल उत्कृष्ट अभिनय नहीं है। 2025 की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस वर्ष स्त्री को देखने का तरीका बदला है, और यही कारण है कि यह कहना अधिक सटीक होगा कि यह वर्ष स्त्री अभिनय का नहीं, बल्कि स्त्री दृष्टि का वर्ष है। इस संदर्भ मे सबसे पहले अभिनय और दृष्टि के अंतर को समझना आवश्यक है। अभिनय एक कला है, जिसे कोई भी पात्र निभा सकता है, जबकि दृष्टि वह वैचारिक स्थिति है जिससे कथा को देखा, समझा और रचा जाता है। लंबे समय तक भारतीय सिनेमा में स्त्री पात्र मौजूद तो थे, लेकिन उनकी कहानियाँ प्रायः पुरुष दृष्टि से गढ़ी जाती थीं। स्त्री दुख सहती थी, प्रेम करती थी, त्याग करती थी या विद्रोह करती थी लेकिन उसकी चेतना, उसका नैतिक द्वंद्व और उसका आंतरिक संसार अक्सर सीमित फ्रेम में कैद रहता था।स्वतंत्रता के बाद के वर्षों में बनी “मदर इंडिया”की नर्गिस भारतीय स्त्री की शक्ति का प्रतीक थीं, लेकिन वह शक्ति भी राष्ट्र और परिवार की उस नैतिक संरचना से जुड़ी थी, जिसे पुरुष प्रधान समाज ने आदर्श के रूप में स्वीकार किया था। नर्गिस का अभिनय कालजयी था, किंतु उनकी दृष्टि व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामूहिक आदर्शों में विलीन थी। मीना कुमारी की त्रासदी अत्यंत गहन थी, पर उनकी पीड़ा प्रायः मौन स्वीकृति में बदल जाती थी थोड़े में कहा जाए तो स्त्री को सहनशीलता की मूर्ति बना दिया गया था।सत्तर और अस्सी के दशक में समानांतर सिनेमा ने इस छवि को चुनौती दी। शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल ने स्त्री को सामाजिक यथार्थ, वर्ग संघर्ष और राजनीतिक चेतना से जोड़ा। “अर्थ” “भूमिका” “मंथन” और “चक्र” जैसी फिल्मों में स्त्री ने प्रश्न पूछे, निर्णय लिए और विद्रोह भी किया। परंतु यह सिनेमा सीमित दर्शक वर्ग तक सिमट गया पर मुख्यधारा अब भी स्त्री को भावनात्मक सहारा मानकर चलती रही।नब्बे के दशक और उसके बाद स्त्री पात्र फिर से मुख्यधारा में आए, लेकिन अधिकतर पारिवारिक और रोमांटिक फ्रेम के भीतर। काजोल, माधुरी दीक्षित, रानी मुखर्जी जैसी अभिनेत्रियों ने इन भूमिकाओं में गहराई भरी, पर कथा की दृष्टि अब भी पुरुष केंद्रित रही। विद्या बालन की “कहानी” एक महत्वपूर्ण मोड़ थी, जहाँ स्त्री पहली बार थ्रिलर की धुरी बनी, लेकिन यह अपवाद था, प्रवृत्ति नहीं। दरअसल 2025 का महत्व यहीं से स्पष्ट होता है, यह वह वर्ष है जब स्त्री दृष्टि अपवाद नहीं रही, बल्कि सिनेमा और ओटीटी दोनों माध्यमों की स्वाभाविक भाषा बन गई। अब स्त्री केवल कहानी का हिस्सा नहीं है, वह कहानी को देखने वाली आँख बन चुकी है।यामी गौतम की “हक़”इस परिवर्तन का सशक्त उदाहरण है। यहाँ स्त्री किसी नाटकीय विद्रोह या आक्रामक मुद्रा के साथ सामने नहीं आती। उसका संघर्ष भीतर का है यानी आत्मसम्मान, अधिकार और पहचान के लिए संघर्ष। यामी का अभिनय संयमित है, लेकिन उसी संयम में उसकी ताक़त छिपी है। यह स्त्री न दया माँगती है, न सहानुभूति बल्कि सिर्फ अपने अधिकार की स्वीकृति चाहती है। यह दृष्टि पहले के सिनेमा में दुर्लभ थी।
काजोल की “माँ” भारतीय सिनेमा में मातृत्व की छवि को पुनर्परिभाषित करती है। लंबे समय तक माँ को त्याग, सहनशीलता और नैतिक श्रेष्ठता की प्रतिमा बनाकर प्रस्तुत किया गया पर 2025 की माँ थकी हुई है, भ्रमित है, कभी-कभी क्रोधित भी होती है। काजोल का अभिनय यह स्वीकार करता है कि मातृत्व कोई दिव्य स्थिति नहीं, बल्कि एक मानवीय अनुभव है। यह स्वीकार्यता स्त्री दृष्टि की परिपक्वता का प्रमाण है।क्षेत्रीय सिनेमा में रुक्मिणी वसंत का “कांतारा : चैप्टर 1” यह दिखाता है कि स्त्री दृष्टि अब केवल शहरी या शिक्षित वर्ग की सीमा में नहीं है। लोक और परंपरा के भीतर भी स्त्री अपनी भावनात्मक उपस्थिति दर्ज करा रही है। पहले ग्रामीण कथाओं में स्त्री अक्सर प्रतीक बन जाती थी जैसे धरती, देवी या बलि। यहाँ वह जीवित मनुष्य है, जो परंपरा के भीतर रहते हुए भी अपने भाव और निर्णय के साथ मौजूद है।
इतिहास आधारित फिल्मों में पत्रलेखा की “सावित्रीबाई फुले” इस बदलाव को और स्पष्ट करती हैं। पहले ऐतिहासिक स्त्री पात्रों को महिमा मंडित किया जाता था पर 2025 का सिनेमा इतिहास को अनुभव के रूप में देखता है। सावित्रीबाई यहाँ मूर्ति नहीं, बल्कि डर , थकान और साहस के साथ संघर्षरत शिक्षिका और स्त्री हैं। एक तरह से यह इतिहास को भी मानवीय दृष्टि से देखने की भी पहल कही जा सकती है।
ओटीटी प्लेटफॉर्म ने स्त्री दृष्टि को वह विस्तार दिया, जो सिनेमा अक्सर समय की कमी के कारण नहीं दे पाता था। ओटीटी ने स्त्री को सोचने, बदलने और टूटने का समय दिया। शेफाली शाह की “दिल्ली क्राइम “इसका सबसे प्रभावशाली उदाहरण है। उनका अभिनय किसी ‘मजबूत महिला अधिकारी’ का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी, नेतृत्व और मानवीय बोझ को सामने लाता है। यह स्त्री नेतृत्व का ऐसा रूप है जो आदेश नहीं देता, बल्कि निर्णयों की कीमत समझता है।हुमा क़ुरैशी की “महारानी” सत्ता में स्त्री की यात्रा को जटिलता के साथ दिखाती है। यह न तो विजय का उत्सव है, न पीड़ित होने का विलाप। यह सत्ता की धीमी, थकाऊ और नैतिक रूप से कठिन प्रक्रिया है।

हुमा का अभिनय यह दिखाता है कि सत्ता स्त्री को मुक्त भी करती है और बाँधती भी। यह द्वंद्व स्त्री दृष्टि की गहराई को दर्शाता है।
रसिका दुग्गल और तिलोत्तमा शोम जैसी अभिनेत्रियाँ उस परंपरा को आगे बढ़ाती हैं जिसकी नींव शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल ने रखी थी, लेकिन फर्क यह है कि अब यह परंपरा हाशिए पर नहीं है बल्कि ओटीटी के माध्यम से यह मुख्यधारा की चेतना बन रही है। उनके पात्र असुविधाजनक हैं, प्रश्नवाचक हैं और समाधान नहीं देते और यही उनकी ताक़त है।
2025 का यह परिवर्तन केवल महिला कलाकारों की उपलब्धि नहीं है। यह लेखकों, निर्देशकों और दर्शकों की बदलती संवेदना का भी परिणाम है। दर्शक अब यह स्वीकार कर चुके हैं कि स्त्री की कहानी भी उतनी ही जटिल, रोचक और महत्वपूर्ण हो सकती है जितनी किसी भी पुरुष नायक की। ओटीटी और समकालीन सिनेमा ने इस स्वीकार्यता को मंच दिया है।इस दृष्टि परिवर्तन का सामाजिक महत्व भी है। जब सिनेमा स्त्री को सोचने, निर्णय लेने और गलती करने का अधिकार देता है, तो समाज भी धीरे धीरे उसी दिशा में बढ़ता है। सिनेमा यहाँ केवल मनोरंजन नहीं रहता, वह सामाजिक संवाद का माध्यम बन जाता है।
यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि 2025 भारतीय सिनेमा और ओटीटी के इतिहास में उस मोड़ का संकेत है, जहाँ स्त्री कहानी का विषय नहीं, बल्कि कहानी की आँख बन चुकी है। अभिनय अब भी महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण है वह दृष्टि जिससे कथा कही जा रही है। यही कारण है कि 2025 को याद करते हुए यह कहना सबसे उपयुक्त होगा कि यह वर्ष स्त्री अभिनय का नहीं, स्त्री दृष्टि का वर्ष है।

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